शनिवार, मई 26, 2012

आज तुम्हारे अलावा कुछ भी बीता नहीं है मुझपर.....

किले का परकोटा इतना खूबसूरत और विशाल था कि उसे एक निगाह में समाया जा सकना मुमकिन नहीं था. शाम की बेसलीकी रात में बदलने ही वाली थी. किले के प्रवेश द्वार पर सजीले ऊँट भी सवारी करवाने को तैयार थे. मुझे लगा कि इस खूबसूरत जगह पर मैं शायद पहले भी कभी आयी हूँ. मन ही मन सोचने लगी कि किले के अन्दर जाने से बेहतर होगा ऊँट कि सवारी करना.
 
यकायक पीछे से आयी आवाजों से कहीं आग लगने का अंदेशा हुआ. मुड़कर देखा घनघोर धुआं दिखाई दे रहा था. पर तुमने जिस बेफिक्री से मेरा हाथ थाम रखा था मेरे पैर यंत्रवत आगे बढ़ते रहे. तुम्हारी आँखों में सवाल नज़र आ रहे थे पर तुमने कुछ पूछा नहीं था....मुझे लगता है तुमने जवाब भी जान ही लिए होंगे....
 
 काश कि ये प्यार भी पीले पत्तों की बिछी चादर जैसा होता जिसे रौंदकर बेफिक्र रहा जा सकता.
 
जी करता है कि एक कोरे कागज़ पर वो सब लिख डालूँ जो बेतरतीब होकर बुझ गया है. राहतों के पुल बनाकर तुम उनपर रोज़ ही चलना सिखाते हो मगर मेरी उम्मीदों के पाँव डगमगाने लगते हैं. लौ बुझने को है और रोशनी के आखिरी पलों में तुम्हारी सूरत देखना चाहती हूँ....तुमने ही कहा था एक बार..." तुम किस अंधरे के बात करती हो कि चांदनी भी जिसका साथ कभी-कभी ही छोड़ पाती है "
 
 वो दूर कहीं बुझ रहा है चाँद भी....बीते दिनों को याद करना गवारा नहीं कि आज तुम्हारे अलावा कुछ भी बीता नहीं है मुझपर..... और इस बीत जाने के अलावा चाहा नहीं है कुछ भी...
 
 

2 टिप्‍पणियां:

  1. सोच रहा हूँ कि , अब से पहले क्यों नहीं आ पाया इस ब्लॉग पर .. जो कुछ भी लिखा है ..वो शब्द शब्द मन में उतरता है .... मैं क्या कहूँ ..सोच रहा हूँ अब भी .

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  2. शुक्रिया विजय जी, इस ब्लॉग को पढ़ने और पसंद करने के लिए.

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