सोमवार, जून 25, 2012

ज़िन्दगी....एक सफ़र है सुहाना ?

पूरे एक महीने तक अपने घर को नए रंगों और नए आयामों से सजाने के बाद सुकून से नींद आयी. बिटिया कुछ दिनों से नानी के घर गयी हुई थी. वो मुझे और मैं उसे बहुत याद कर रहे थे. अब ये मुमकिन था कि मैं बिटिया को लेने जा सकूँ, साथ ही अपने प्रियजनों और मित्रों से भी मिल सकूँ. आनन-फानन में यहाँ से जोधपुर और फिर आगे जयपुर तक का प्रोग्राम बनाया गया क्यों कि एक नियत तिथि तक यहाँ फिर से उपस्थिति दर्ज  करवानी ज़रूरी थी.


जिस दिन हम यहाँ से रवाना हुए मौसम ने खूब साथ दिया. ऐसा लगा कि बारिश ज़रूर होगी. बारिश तो नहीं हुई पर सफ़र बहुत सुहाना रहा. जोधपुर पहुँचने पर हमेशा ही ऐसा होता है कि बस दिन भर वहाँ काम निपटाने होते हैं. कितनी सड़कों से कितनी यादें जुड़ी होती हैं, पर वो सब पीछे छूटती जाती हैं..... दिन अपनी रौ में बहता रहता है. शाम को किसी अच्छे रेस्तरां में खाना खाया और फिर शहर की यादों को सीने में छुपाकर सो गयी. 

अगले दिन शाम तक मैं जयपुर पहुँची.जयपुर शहर से अभी लगाव महसूस नहीं होता. पर बेटी से बहुत दिनों बाद मिली थी इसलिए बहुत खुश थी और फिर माँ के साथ तो मैं जितना भी वक्त गुजारूं कम ही लगता है.

 उसी शाम एक बहुत पुराने मित्र के साथ सपरिवार एक रेस्तरां में रात्रिभोज किया. कुछ नाराजगियां कभी साथ नहीं छोड़तीं. ऐसा ही कुछ मेरे और भाई के साथ है. वो मुझसे खुश कब हुआ ये तो याद नहीं पर नाराज़ अक्सर ही रहता है. उसे ये बात नागवार गुज़रती है कि मैं दो-चार दिन के अल्प समय में भी कुछ वक्त दोस्तों के साथ बाँट लूँ. शायद जिन चीज़ों से हम भागते रहते हैं वो बार-बार हमारे सामने आ खड़ी होती हैं. मैंने अगले दिन घर पर ही रहने और साथ खाना खाने का मन बनाया था, शायद भाई खुश हो जाता. पर अचानक एक दूसरे मित्र के बुलावे पर मुझे लंच करने उसके घर जाना पड़ा. ये सब इतना जल्दी में हुआ कि मुझे कुछ और सोचने का मौका ही नहीं मिला. दोस्त के साथ वो दिन बहुत खूबसूरत बीता और शाम घर पर ही बेहद हसीन. 


दो दिन बाद जोधपुर वापसी थी पर एक अफ़सोस खाए जा रहा था कि छुट्टियाँ ऐसे ही बीत जाएँगी और एक दोस्त को इस समय मेरी सबसे ज्यादा ज़रूरत है पर मैं उससे मिल नहीं पा रही हूँ. दरअसल मेरी एक मित्र ने पिछले दिनों एक गंभीर बीमारी में अपने पति को खो दिया और मैं अब तक उससे मिल नहीं पाई थी. मुझे मालूम था कि ये बेहद ज़रूरी था पर अब तक ये मुलाक़ात हो नहीं पाई थी. बातों ही बातों में पूरा प्रोग्राम बदल गया. अगले ही दिन वोल्वो से दिल्ली का सफ़र किया. बस का सफ़र बहुत मुश्किल लगता है इसलिए एक दिन आराम करने के बाद एक कार टैक्सी से पंजाब का रुख किया. 


सबसे मुश्किल काम लगता है मुझे किसी को ये समझाना कि जो हो गया उसे बदला नहीं जा सकता....या फिर सब कुछ डेस्टिनी है. मैंने अपनी मित्र को फोन पर कहा कि मैं उसके पास आ रही हूँ. 

पर हमारे तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार हमें पहले अमृतसर जाना था और फिर अगले दिन  उस मित्र के पास जालंधर आना था. अमृतसर में जितना भी वक्त बिताया बहुत खूबसूरत था. स्वर्ण मंदिर एक बार तो सबको देखना ही चाहिए. अत्यधिक गर्मी के बावजूद भी लोगों की श्रद्धा देखते ही बनती है. और शाम को वागा बॉर्डर पर सब लोगों का जोश और जूनून काबिल-ए-तारीफ़ है. पड़ोसी मुल्क के लोगों को इतना करीब से देखा. पर सबसे खूबसूरत दृश्य तो वो था जिसमें दोनों मुल्कों का द्वार खुलते ही एक छोटी सी गिलहरी अपनी मस्ती में इस मुल्क से उस मुल्क तक की सैर चंद मिनटों में कर आयी और वो भी बिना वीसा और पासपोर्ट के. सोनू निगम का गाया गाना बहुत याद आया उस वक्त," पंछी...नदिया....पवन के झोंके.....कोई सरहद ना इन्हें रोके......"


अब हमारी रवानगी हुई जालंधर. देश के जाने-माने इंस्टिट्यूट में नाम आता है लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी का, उसी में लेक्चरर है मेरी मित्र. लगभग नौ सौ एकड़ मैं फैला इंस्टिट्यूट और उसकी एक बिल्डिंग के पांचवे फ्लोर पर, एक कमरे में बसी मेरी मित्र की बची हुई दुनिया. सब कुछ सामान्य से अधिक शांत. "बच्चों को शाम को क्रेच से ले आउंगी." ऐसा उसने कहा. हम उससे एक बार फिर वही बातें करने लगे जो पिछले तीन-चार महीनों से उससे फोन पर होती रहीं थी. इस बार उसके आंसू नहीं बहे. उसे थोड़ा संभला हुआ देखकर अच्छा लगा. 

बच्चों ने आते ही रौनक बढ़ा दी. उसकी दोनों बेटियाँ मेरी बिटिया से छोटी हैं पर तीनों इतना ज्यादा घुल-मिल गयी मानो रोज़ ही मिलती रही हों. उसकी छोटी वाली बिटिया तीन साल की है, बेहद मासूम. बच्चों को लेकर हम लोग शाम को बाहर घूमने निकले. जालंधर का मशहूर रेस्तरां 'हवेली'.....क्रिएटिविटी की बेहतरीन मिसाल. ठेठ पंजाबी माहौल...बच्चों के साथ मिलकर हम सब ने वहाँ खूब अच्छी शाम गुज़ारी.

एक वीरानगी उसकी आँखों में .....और एक कमी उसकी मुस्कराहट में भी दिखती रही..... ज़िंदगी इतनी बेरहम कैसे हो जाती है कभी-कभी. 

मुझे अगले दिन सुबह दिल्ली के लिए रवाना होना था. उसकी छोटी वाली बिटिया ने नींद से उठते ही कपड़ों की अलमारी खोली, अपनी एक ड्रेस निकालकर मम्मी से बोली,"मुझे मौसी के साथ ही जाना है." उस मासूम को झूठा दिलासा देकर मुझे वहाँ से रवाना होना पड़ा. रास्ते भर हम उनकी ही बातें करते रहे. दिल को तसल्ली मिली उससे मिलकर..... वो अपनी ज़िंदगी में लौट रही है धीरे-धीरे. ढेरों दुआएं उस दोस्त के लिए जिसने मेरे अच्छे-बुरे वक्त में मेरी फ़िक्र की. शाम तक मैं दिल्ली लौट आई और एक दिन बाद जोधपुर. 

मैं जानती थी सिरोही पहुँचने के लिए मैं पहले से ही दो दिन लेट हो चुकी थी इसलिए जोधपुर से जल्द से जल्द सिरोही आना था. इस दौरान दो-तीन मित्रों से गर्मी की छुट्टियों में मिलने का वादा निभा नहीं सकी, उन सबसे माफ़ी चाहती हूँ.

लौटकर आयी तो मेरी जालंधर वाली मित्र का ई-मेल आया हुआ था....उससे मिलना कितना ज़रूरी था ये सिर्फ़ उस मेल को पढ़कर जाना जा सकता है. मुझे जितना लग रहा था कि उसे मेरी ज़रूरत है उससे कहीं ज्यादा उसे मेरी ज़रूरत थी.....