गुरुवार, जनवरी 19, 2017

रविवार, मार्च 09, 2014

इत्ती सी ख़ुशी

पार्क की एक ऐसी बेंच को उसने चुना जहाँ बैठकर वो सामने की इमारत में आते-जाते लोगों को देख सकती थी पर खुद उसे कोई नहीं देख सकता था कि एक छोटे से पेड़ की आड़ में वो ज़रा छुपकर बैठी थी. हाँ, ये जगह हमेशा अच्छी लगती है कि यहाँ मुझे कोई देख नहीं पायेगा...उसने मन ही मन सोचा...वो जब भी उदास होती तब यहीं आकर बैठ जाया करती थी. पार्क में माली को काम करते देखती रहती, अपने फोन से खेलती रहती, सामने वाली इमारत में आते-जाते लोगों को देखती रहती और अपने दोस्तों को फ़ोन पर जवाब देती कि आज किसी से मिलने का मन नहीं है...

इमारत के अन्दर जाने के लिए दो दरवाज़े बने हुए थे और वहाँ बरसों से एक कॉलेज चल रहा था. उसे कॉलेज के लोगों में ज़रा भी दिलचस्पी नहीं थी और न ही उस इमारत के नक़्शे में, वरन जिस जगह पर वो बैठी थी वहाँ से भी लोगों की फ़ीकी मुस्कानों को पढ़ लिया करती थी...

कि कोई ये कैसे बताये कि वो तन्हा क्यूँ है...वो अपने दोस्तों की अज़ीज़ दोस्त है और अपने घर में सबकी सबसे ख़ास...कोई ऐसा मुकाम नहीं था जो उसने सोचा हो और पाया न हो...वो छोटी-छोटी खुशियों में खुश होना जानती थी और उदास होने की कोई पुख्ता वजह नहीं थी...पर जीने के लिए कोई शगल पालना था और न जाने कब और कैसे उदासी उसका शगल बन गयी...

ख़ुशी जैसे एक तितली थी उसके हाथ ही नहीं आती थी और वो बस हर वक़्त उस एक तितली के पीछे-पीछे दौड़ती रहती थी जिसके रंग लुभावने थे और छवि मोहक. कभी-कभी उसे लगता था कि ये खूबसूरत ख्वाब है कि वो बस उस तितली को छूने ही वाली है और कभी उसे लगता कि वो खुद एक तन्हा उदास तितली बन गयी है. उदासी, उसके दिन का एक ज़रूरी हिस्सा बन गया था.

हर दिन की शुरुआत एक अनमनेपन से होती और अंत एक गहरी हताशा से. एक तृष्णा जो उसे दिन भर भटकने पर मजबूर करती और रात में उसके ख्वाबों में भी उसका पीछा नहीं छोडती. अनगिनत सवाल ज़हन की खाली जगहों को भरते रहते और कभी भरी हुई जगहों को दोबारा भरते.

 ये उसकी लड़ाई थी अपने आप से...!


शुक्रवार, फ़रवरी 07, 2014

उम्रदराज़ पिता

आज अगर पिता होते
तो उम्रदराज़ होते 

सुबह की सैर
माँ को यूँ अकेले नहीं करनी पड़ती 
बल्कि पिता अपने 
कनटोपे के साथ
सर्द सुबहों में भी सैर में उनके साथ होते 
आज अगर पिता होते
तो उम्रदराज़ होते 

बेटियों को ब्याह देना और
उनसे छूट जाना
उनकी सोच नहीं थी 
बेटियों को स्वतंत्र और आत्मविश्वासी देखकर 
मन ही मन खुश हो जाते
आज अगर पिता होते
तो उम्रदराज़ होते 

बेटे से उनका रिश्ता अब तक एक नया रूप ले पाता
उनका झुर्रियों वाला हाथ 
अपने बेटे का माथा सहलाता 
हर कदम पर यकीनन 
दोनों ज़िम्मेदारी बाँट लेते 
आज अगर पिता होते
तो उम्रदराज़ होते 

पिता 
आप घर की धुरी थे 
हम सब के लिए बेहद ज़रूरी थे 

टूट कर बिखर गए हम सब आपके बगैर 
जी न सके एक दिन भी
जी तो रहे हैं खैर

बुधवार, अक्तूबर 09, 2013

शुक्रिया

पिछले कई दिनों से कितने ही सवाल मन में उठते और परेशान करते रहे. अपने बारे में, अपनी ज़िन्दगी के बारे में, दोस्तों के बारे में, अपनों के बारे में और भी न जाने किस-किस के बारे में. ऐसा मंथन चलता रहा कि सवालों के अन्दर से और सवाल उठते रहे और मेरा चैन लूटते रहे. यहाँ तक कि मेरी नींद भी महीनों तक मुझसे रूठी रही. कहीं सुकून नहीं मिलता. अपने-पराये सब पहचाने गए. सोचूं तो कोई परेशानी नहीं....मगर चाहूँ तो कोई हल नहीं. बस एक बेचैनी, अनमनापन....शायद इसे "Mid Life Crisis" कहते होंगे और शायद मेरी उम्र में सभी इससे गुज़रते होंगे. 

अभी पिछले कुछ दिनों से मैं अपने फेसबुक स्टेटस में अपने दोस्तों से कुछ छोटे-छोटे से सवाल कर रही हूँ मसलन "React or Respond ?" , "Strength or Weakness ?" , "Knowledge or Ignorance ?" और दोस्तों के बहुत अच्छे-अच्छे जवाब भी पा रही हूँ. आप सबका शुक्रिया अदा करना चाहती हूँ और बताना चाहती हूँ कि इन सवालों को पूछने का मक़सद मेरे अन्दर उठ रहे सवाल ही हैं. 

 "Strength or Weakness ?" पर मेरे दोस्तों ने अपनी राय दी. दरअसल हम सब जानते हैं कि हमारी अपनी Strength क्या है ? मगर समय और परिस्थितियों के साथ वो Strength कहीं न कहीं दबती जाती है. हालाँकि वो हमारे अन्दर ही रहती है पर हम उसे कभी-कभी भूल जाते हैं. मेरी एक दोस्त ने लिखा भी था कि Strength और Weakness दोनों ही हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा हैं. जैसे ही हम एक को स्वीकारते हैं, दूसरे को नकार देते हैं. इसका मतलब जब हम अपनी Strength को भूलने लगते हैं, हमारे व्यक्तित्व की Weaknesses हम पर हावी होने लगती है. हम अपनी  Strength से जितना दूर होते जाते हैं, अपनी Weaknesses के उतना ही पास. 


"React or Respond ?" के जवाब में हम सब Respond ही कहना चाहते हैं. पर मैंने महसूस किया है कि जब हमारे सामने Situation आती है , कभी-कभी हमारी Weakness हम पर हावी हो जाती है और हम Respond करने के बजाय React कर जाते हैं. दरअसल Respond करने का मतलब अपनी Strength से जवाब देना होता है. और कितनी ही Situations को React करने के बजाय Respond  करके संभाला और संवारा जा सकता है.


 "Knowledge or Ignorance ?" के जवाब  में मुझे लगता है कि हम सबको इतना Knowledge तो होना ही चाहिए कि किन चीज़ों को Ignore करें और किन्हें अहमियत दें. 

हो सकता है कि मेरे दोस्त पहले से ही ये सब बातें अच्छी तरह जानते हों पर मैंने जब उनसे सवाल किये तो मुझे अपनी बात भी कहनी ज़रूरी लगी. 





सोमवार, जून 03, 2013

स्मृतियाँ

कितनी भी किफ़ायत से खर्च कीजिये, एक दिन ये सांसें ख़त्म हो ही जाती हैं. महबूब के लिए बचाकर रखी हुई सांसें एक दिन उस महबूब का पता ढूंढते-ढूंढते अपना पता भूल जाती हैं और अपने घर लौट आने के बजाय एक सूनी राह पर दम तोड़ देतीं हैं. ऐसी ही कई बमुश्किल हासिल की गई सांसों ने बार-बार उस महबूब का नाम पुकारा और लौट आने से पहले ही राह में कहीं दम तोड़ दिया.

आ ही जाती है बेवफाई की उम्र वफ़ा की इस राह पर चलते-चलते. वादों की कोई उम्र नहीं होती. अपनी हार, अपने वादे, अपने ज़ख्म क्यूँकर याद रखेगा कोई? क्या भूला जा सकता है इन्हें? या फिर भूल जाने का भरम बस कुछ पलों का ही है? कुछ पलों के सच को ज़िन्दगी भर का सच तो नहीं माना जा सकता. और फ़िर ज़िन्दगी भर का सच किसे कहेंगे? जो हम जी रहे हैं क्या वो ज़िन्दगी भर का सच नहीं है?

महबूब से मिलकर लगा यही एक सच है, बिछड़कर और भी सच लगा. फिर उसका इंतज़ार एक सच क्यूँ नहीं हो सकता? उसका साथ न होना ही उसका होना क्यूँ लगता है? इस न होने को अगर भूल जाऊं तो वो हर पल मेरे साथ ही है. बस उसे पकड़कर कैद करने की जानलेवा कोशिश नहीं करना चाहती. वो भी मेरे साथ न होने को यक़ीनन साथ होना ही मानता होगा, ये एक सच भी तो हो सकता है.

बारिश की बूंदों में झरती हमारी हंसी एक खुशगवार दिन का सच रही है. घास पर बिखरी ओस की बूंदों जैसी हंसी....हवाओं में एक गीत....एक संगीत बिखेरती हंसी....हम दोनों को जोड़ने वाली हंसी....

स्मृतियों की नीव एक सच पर रखी होती है....उस सच के साथ जीने की कोशिश हमें अपने आप से दूर किये जाती है, फिर भी हमारे वजूद का एक ज़रूरी हिस्सा हैं स्मृतियाँ....

बुधवार, जनवरी 16, 2013

रीती हुई तन्हाई में बीता हुआ दिन

दिल छलनी हो चुका है अब इन घावों पर नमक डालकर दर्द का एहसास न करवाओ। साल ज़रूर नया है मगर घाव वही पुराने से ....तुम मुझे बस एक वजह बताओ कि मुझे तुमसे अब भी प्यार क्यूँ करते रहना चाहिए ....अब तो मुझे रोना भी नहीं आता कि जी हल्का हो जाये ....आह ! आस-पास सब कुछ इतना तेजी से बदल रहा है ...बस ये माइग्रेन का दर्द है जो बरसों से बदला नहीं है ...

रीती हुई तन्हाई में बीता हुआ दिन ....जो कुछ भी आपने पास चाहा वो दूर ही नज़र आया ...और ....जो कुछ सोचा नहीं था वो जीवन का एक हिस्सा बन गए ... उदास जी , उदास दोस्त , उदास रातें ,उदास सपने और जाने क्या क्या उदास ...एक उदास दिन में उस पुराने ख़्वाब की दस्तक जिसमें पापा दिखाई देते हैं ...

सत्रह साल होने को आये पापा को ये दुनिया छोड़े पर मेरे सपनों में वो आज भी छुक-छुक रेलगाड़ी में हमको घुमाने वाले पापा बनकर आते हैं ...और मैं उनसे कहती हूँ कि छोड़ो पापा , अब और नहीं घूमना है ...बस सुबह देर तक सोने का मन है ...पापा राइम करने लगते हैं, "जो सोयेगा वो खोएगा ....जो जागेगा वो पायेगा ..." और जब जाग जाती हूँ तो सोचती हूँ की पापा से कहूँ कि चीज़ें बदल गयी हैं ...अब चैन की नींद आये एक ज़माना गुज़र गया है ....अब सोकर कुछ नहीं खोना है अलबत्ता सुकून ज़रूर मिल जायेगा ....

माँ की चिंताएं एक दम अलग हैं ...कहती हैं तुम सब लोग तैयार रहना मैं कभी भी अंतिम विदाई ले लूंगी . कोई उन्हें कैसे बताये कि उनके होने का क्या अर्थ है हमारे लिए ...वो एक ऐसी धुरी हैं जिसके चारों ओर पूरे घर की खुशियाँ चक्कर लगाती हैं ....तुम सदा सलामत रहो माँ ...खुश रहो माँ कि आज जी बहुत उदास है ....

 उसने कहा यकीन मानो
 मैं तुम्हें उदास नहीं देख सकता 
 मैंने पूछा
 बस एक बात बताओ 
 मुझे ख़ुशी किस चीज़ से मिलती है ?

 हमेशा की तरह वो खामोश ही रहा ....