गुरुवार, अप्रैल 28, 2011

कुछ इत्तिफ़ाक खतों की तरह हसीन होते हैं

कुछ इत्तिफ़ाक खतों की तरह हसीन होते हैं और उनके मजमून किसी ख़्वाब जैसे अनजाने और अप्रत्याशित.....मसलन, एक लम्बी वीरानी के बाद खुद चाँद धरती पर उतर आये और अपनी सारी चांदनी को लुटा देने का हौसला दिखा दे. वीरान ख्वाबों की बंजर ज़मीन पर रूहानी प्यार का मौसम दस्तक दे रहा है कि तुम अब मेरे ख्वाबों का ही नहीं, ज़िंदगी का भी अहम हिस्सा हो.

             मैंने हर ख़्वाब में तुमसे ये गुज़ारिश की है कि तुम मेरे खतों में वो सब पढ़ना, जो लिखा नहीं है. कि नदी ने अब अपना रुख बंजर ज़मीन की ओर कर लिया है.....आवारा हवाओं ने सारे फूलों की खुशबू समेट ली है इस कायनात में लुटाने को.....सारे साज़ बज उठे हैं अपना मधुर संगीत बिखेर देने को, गोया इन्हें अपनी मंजिल मिल गयी हो.

             इस बेलगाम भागती ज़िंदगी में तुम्हारा मिल जाना भी तो किसी इत्तिफ़ाक से कम नहीं ना ? मैंने हमेशा तुम्हारे कहे शब्दों को एक जीवित एहसास की तरह जी भरकर जिया और महसूस किया है. शब्दों के एक-एक घूँट को हलक से उतारते हुए मुझे हमेशा सुकून का एहसास हुआ. इस जादू में खोकर बाकी सब छोटा और झूठा लगने लगा है.

            'टेलीपेथी' के बारे में तो सुना होगा तुमने ? ये मानसिक संदेश वो जादू है कि अगर इन्हें भेजने वाला इंसान इसे भेजना चाहता हो और ग्रहण करने वाला इंसान इन्हें ग्रहण करना चाहता हो तो मीलों की दूरी भी कोई मायने नहीं रखती. इसे किसी ज़रिये की भी ज़रूरत नहीं होती. इसलिए जब दिल करे जी भरकर याद करना दोस्त, उसे जिसे तुम चाहते हो अपने पास देखना,साथ-साथ देखना.

3 टिप्‍पणियां:

  1. तुम अब मेरे ख्वाबों का ही नहीं, ज़िंदगी का भी अहम हिस्सा हो

    बहुत कुछ कहती पंक्ति..

    ब्लॉगस्पॉट पर आपको देखकर अच्छा लगा. लिखती रहिये.

    मनोज

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  2. टेलीपैथी का जादुई सच... महसूस किया है.... कितनी ही बार...!

    बस शिद्दते दोनो तरफ बराबर की होनी चाहिये....

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  3. @ मनोज जी, प्रेरित करने के लिए बहुत शुक्रिया...
    @ कंचन , पता नहीं वक्त के साथ एक तरफ शिद्दत कम क्यों हो जाती है ? सब बदला-बदला सा क्यों दिखाई पड़ता है ?

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