मंगलवार, फ़रवरी 14, 2012

कुछ ही देर में ये मुलाक़ात खत्म हो जायेगी...

तुम्हारी याद अपने होने में निरंतर है...उसे मुझसे कोई अपेक्षा नहीं है कि मैं उसके आने या ना आने पर कुछ ध्यान दूँ ...बस वो आती ही है...हमेशा...

कुछ भी बदला ना, तो मैं रो-रो कर मर जाऊंगा...ऐसा लड़के ने कहा था.

लड़की को कभी अपने किसी फैसले पर कोई शक नहीं था, तभी तो वो शुरुआती दिनों में भी उतनी ही ईमानदारी से हँस कर कहा करती थी कि मेरा यकीन करो अब कुछ भी नहीं बदलेगा...कम-से-कम मेरी तरफ से तो नहीं... 

वो बस मुस्कुरा दी ये सोचकर कि देखना एक दिन यही लड़का बदल जायेगा... वो उसे इतना टूटकर चाहेगी  कि लड़का सब कुछ भूल जायेगा...पर सच्चाई तो कुछ और ही है ना...इसलिए एक दिन सब बदलने लगेगा और उसका दिल टूट जायेगा...ये परीकथा तो है नहीं...

पहली  मुलाक़ात में उसका हाथ एक टेबल पर था जिसे लड़के ने थाम लिया था. लड़की ने भी जब उसे अपनी पलकों से छू लिया तो उसकी उंगलियाँ लरज़ उठी थीं. वो दोनों चुपचाप बस कॉफी के प्याले से उठते धुंए को देखते रहे...वो लड़की को प्यार से चूम लेना चाहता था...ये सोचकर लड़की की आँखों में आँसू आ गये कि कुछ ही देर में ये मुलाक़ात खत्म हो जायेगी. लड़का चला जायेगा लेकिन बाकी सब कुछ पीछे छूट जायेगा. क्या सचमुच लड़का जा पायेगा ? अगर उसे जाना ही होता तो वो उस लड़की को ढूँढते हुए आता ही क्यों ? 

कुछ ही देर में ये मुलाक़ात खतम होने को थी...लड़के ने एक बारे फिर प्यार से लड़की का हाथ थाम लिया...इस स्पर्श में एक गहरी आश्वस्ति थी...लड़की उसे जाते हुए देखती रही और कुछ डूबता हुआ सा महसूस करने लगी...अपना ही शहर उसके चले जाने से बेगाना हो गया...

वो उसे टूटकर चाहने लगी और लड़का भी उस पर जी जान से मरता था...पर दोनों में सिर्फ़ एक ही अंतर था कि  वो उसे बस चाहती ही रही और लड़के का जब मन करता उसे चाहना बंद भी कर देता और फिर यूं ही उसे बेइंतहा चाहने लगता...उसे कई-कई वास्ते देता...उसकी बहुत तारीफ़ करता फिर जब मन करता उसे दिल से निकल देता...

जिस  तरह ज़िंदगी में कुछ भी स्कोर नहीं किया जा सकता वैसे ही प्यार में भी कुछ स्कोर नहीं किया जा सकता....कितनी मिन्नतें...कितने वादे...कितनी ही मुलाकातें...और फिर एक दिन क़यामत का...जब कुछ भी शेष नहीं रह जाता...सिवाय एक सवाल के कि ये सब हुआ क्यों था ?




सोमवार, जनवरी 02, 2012

इज़ाडोरा की प्रेमकथा

इज़ाडोरा डंकन की आत्मकथा 'माय लाइफ' का हिंदी अनुवाद 'इज़ाडोरा की प्रेमकथा ' का नाम ही इजाडोरा की ज़िंदगी के महत्त्वपूर्ण पहलू यानि प्रेम से ओत-प्रोत है. इज़ाडोरा ने अपनी पूरी ज़िंदगी दो चीज़ों को समर्पित कर दी ; नृत्य और प्रेम. इज़ाडोरा ने कला और प्रेम को कभी अलग -अलग नहीं माना बल्कि उसका मानना था की कलाकार ही प्रेमी हो सकता है, उसी के पास सौंदर्य को देख पाने की सच्ची दृष्टि होती है. इसी तरह प्रेम जब सनातन सौंदर्य को निहारता है तो आत्मा की आँखें भी खुल जाती हैं और सौंदर्य कला बन जाता है.

        इज़ाडोरा के बचपन की उन्मुक्तता ही उसके संपूर्ण जीवन का आधार -स्तंभ बनी, जिसने उसे विवाह जैसी संस्था का कट्टर आलोचक बनाया. इज़ाडोरा का जन्म समुद्र के आस -पास हुआ और अपने जीवन के सबसे खूबसूरत पलों को उसने समुद्र के आस -पास ही बिताया. समुद्र की बेचैन लहरों ने उसे हमेशा सुकून ही पहुंचाया , शायद इसकी उन्मुक्तता इज़ाडोरा को आकर्षित करती रही होगा. ताज़िन्दगी बंजारों की तरह इज़ाडोरा ने भी दुनिया भर में डेरे डाले और एक अदद सच्चे प्रेम की तलाश में उसने मीलों का सफर तय किया.

         बिना किसी नृत्य प्रशिक्षण के इज़ाडोरा ने अपने नृत्य की प्रेरणा प्रकृति से ही ली. विशुद्ध प्राकृतिक माहौल में पली इज़ाडोरा ने अपनी माँ के पियानो के संगीत की धुन पर थिरकना शुरू किया और सारी ज़िंदगी अपने आप को तेज ओर्केस्ट्रा की धुनों से दूर रखना चाहा. कई पियानोवादकों की धुनों पर नृत्य के नए -नए प्रयोग करते हुए नए आयाम स्थापित किये. खुद इज़ाडोरा के अनुसार यदि उसे एकल नृत्य में अपना अस्तित्व खोजना होता तो उसकी ज़िंदगी कहीं ज़्यादा सरल और भटकाव से दूर होती. पर छः वर्ष की कच्ची उम्र में ही इज़ाडोरा नृत्य-स्कूल खोलने का सपना देखने लगी और बाद में उसने तमाम परेशानियों के बावजूद भी अपने जीवन का लक्ष्य नृत्य-स्कूल ही रखा. जहां हज़ारों बच्चों पर वर्षों तक उसने कड़ी मेहनत की और उन्हें एक साथ मंच पर नृत्य करवाने का सपना भी पूरा किया. 

इज़ाडोरा ने जब भी, जहाँ भी नृत्य किया वहाँ नीले रंग के पर्दों की मौजूदगी ज़रूर रही,ये भी उसका समंदर से लगाव ही बताता है शायद.
 
नृत्य की तरह प्रेम में भी उसके प्रयोग किशोरावस्था से ही शुरू हो गये थे. इज़ाडोरा को सच्चे प्रेम की तलाश थी. उसके पुरुष-प्रेम में कहीं-कहीं ठहराव के होते हुए भी चिरंतन प्यास का आभास होता है. कुछ लोगों को उसके उन आज़ाद खयालों से परेशानी ज़रूर हो सकती है, जिसके चलते उसने विवाह को एक बंधन माना. उसने विवाह किये बिना ही ऐसे तीन प्यारे -प्यारे बच्चों को जन्म दिया था जिनके पिता अलग-अलग थे. इज़ाडोरा ने अपने पहले दो बच्चों को अथाह प्यार दिया जिसे उसने अपने नृत्य-प्रेम और पुरुष -प्रेम से कहीं ऊपर रखा. और एक दिन भयंकर त्रासदी में उसने अपने दोनों बच्चों को खो दिया. इस घोर दुःख ने उसे नृत्य और ज़िंदगी दोनों से दूर कर दिया. भयंकर अवसाद ने उसे बार -बार आत्महत्या जैसे ख्यालों की ओर धकेला, लेकिन अपनी ज़िंदगी से प्यार करने वाली इज़ाडोरा ने ज़िंदगी का दामन पकडे रखा. फिर एक दिन समुद्र पर टहलते हुए उसकी मुलाकात जिस शख्स से हुई वही शख्स उसके तीसरे बच्चे का पिता बना. ये खुशी बस चंद घंटो की ही थी . उस बच्चे के देहांत ने इज़ाडोरा को अनंत भटकाव में छोड़ दिया.

                   इज़ाडोरा ने नृत्य स्कूल के बच्चों के चेहरों में अपने बच्चों को बार-बार तलाशा लेकिन गहरी हताशा और निराशा के दिनों में वर्ष 1914 में छिड़े युद्ध के दौरान उसके नृत्य -स्कूल को एक अस्पताल की शक्ल दे दी गयी.

                     अगले कुछ वर्षों में उसकी ज़िंदगी में कुछ अच्छा नहीं घटा, सिवाय इसके की एक पियानोवादक उसकी ज़िंदगी में फरिश्ता बनकर आया . आने वाले समय में इज़ाडोरा की ही एक शिष्या के साथ इस फ़रिश्ते को अपना भविष्य नज़र आया और इज़ाडोरा के लिये ये दुःख अपने बच्चों को खोने जैसा ही रहा.

    त्रासदी की पराकाष्ठा से गुज़रने पर भी इज़ाडोरा ने प्रेम और आध्यात्म पर विश्वास किया. उन्नीसवीं सदी की महानृत्यांगना , महाप्रेमिका और महानायिका जो हमेशा इक्कीसवीं सदी की तर्ज़ पर जीती रही. उसका सपना था अपने इज़ाद किये हुए प्राकृतिक भाव - भंगिमाओं वाले नृत्य को 'अमेरिका के नृत्य ' के रूप में स्थापित करना जिसे पूरा करने में वो काफी हद तक सफल रही. लेकिन अपने  जीवन के अंतिम छः वर्ष उसने रूस में गुज़ारे और एक कार दुर्घटना में रहस्यमय ढंग से उसने दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया.

शुक्रवार, दिसंबर 30, 2011

प्रेम का ये भी एक रूप होता है

 मुझे इस साल के बीत जाने से हमेशा एक डर सा लगा रहता था. ऐसा लगता था कि ये साल जब नया-नया आया था तो तुम्हें साथ लाया था पर जब ये जायेगा तो तुम्हें साथ ना ले जाये और देखो मेरा डर एक दम सही था...ये जाते-जाते तुम्हें भी ले गया...मुझसे दूर...

यूं  ही बातों-बातों में सब कुछ बीत जाता है और हम किसी नए इत्तिफ़ाक का बस इंतज़ार करते रह जाते हैं. साल शुरू हुआ था कि एक नयी बहार ने दस्तक दी, पता नहीं किसकी दुआओं का असर था ये. एक खोयी खुशी मेरा पता पूछकर मेरे पास चली आयी और यकीन दिलाती रही कि वो अब कभी वापस नहीं जायेगी. मैंने उसके हाथों को थामा और अपने होठों से उसे छुआ...मेरी आँखों से आंसुओ की कुछ बूंदें उन हाथों पर गिर गयी....दो पल के लिए वो हाथ कांपे और फिर उन्होंने मेरा चेहरा ऊपर उठाया.....मैंने उसकी गीली पलकें देखीं और जाना कि प्रेम का ये भी एक रूप होता है. मैंने जब भी जादू की छड़ी घुमाई वो खुशी मेरा मनचाहा रूप लेकर मेरे सामने हाज़िर हो गयी. 

जादू ही था वो कि बस खत्म हो गया सब कुछ. मुझे लगता है कि तुमने ज़रूर आवाज़ दी होगी, पर वक्त ऐसा चुना होगा कि मुझ तक पहुँची नहीं. वैसे भी कोहरा घना हो तो वक्त का सच छुप ही जाता है... और फिर इस वक्त का सच तो ये कोहरा है... और मैं, बस इसमें खो जाना चाहती हूँ.

वो एक सपना था जिसे मैंने ही अपनी आँखें मल-मल कर तोड़ा था. क्या तुम इस वक्त जान पाओगे कि कोई तुम्हारे बारे में सोच रहा है? क्या हम ठीक उसी वक्त ये जान पाते हैं कि कोई हमारी राह देख रहा होता है? क्या तुम्हें ठीक इसी वक्त मेरी आवाज़ सुनाई दे रही है? तब तो तुमने ज़रूर चौंककर इधर-उधर देखा होगा. बीच सपने में ही तुम्हें किसने बुला लिया कि तुम चले गये? क्या ऐसा हो सकता है कि हम दोनों एक ही वक्त पर एक दूसरे को पुकारें और फिर से एक-दूसरे का हाथ थाम लें?
                  
                           ***                             ***                            ***

साल  बीतने को है उम्मीद अभी बीती नहीं है... जिस रास्ते से वो खुशी बीते साल आयी थी वो रास्ता अभी वहीं खड़ा है... सर्द शामों के साथ कोहरा भी जाता रहेगा कि खुशी से कहना मेरे घर का पता भी बदला नहीं है...



गुरुवार, दिसंबर 08, 2011

दोस्त, जी बहुत उदास है उस दिन से....

एक ही दिन में कई हैरानी भारी बातें एक-एक करके गुज़रती गयीं और वो दिन भी बीत ही गया और दिनों की तरह. ऐसा लगता था कि जैसे एक ही दिन में कई दिन जी लिए. वो शुरू तो कुछ आम दिनों की तरह ही हुआ था पर ज्यों-ज्यों दिन पर सूरज का रंग चढ़ता गया मुझ पर से कई रंग उतरते गये.

माँ पर कुछ भी बुरा बीते ये नागवार गुज़रता ही है . उनके जीवन भर की अमूल्य निधि , उनका स्त्रीधन यानि उनके सोने के गहने एक यात्रा के दौरान यकायक ही खो गये. माँ बहुत बड़े दिल वाली और प्रेक्टिकल परसन हैं फिर भी उनका अपार दुःख फोन पर उनकी कंपकंपाती आवाज़ में साफ़ झलक रहा था. खबर सुनते ही मैंने अपना दिल डूबता हुआ सा महसूस किया, फिर भी अपनी आवाज़ पर संयम रखते हुए मैंने उन्हें ढाढस बँधाया. 

सच पूछो तो वो घटना बताने के बाद मेरी माँ इस बात से ज्यादा चिन्तित थीं कि उनकी चिंता में कहीं मेरी नींद न उड़ जाये. खैर, हम काफ़ी देर इस घटना की अनेकानेक संभावनाओं पर बात करते रहे. ये बात भी कि जिसने भी ऐसा किया होगा क्यूँ किया होगा, हालाँकि हम दोनों ही ये जान रहे थे कि अब इन बातों के कोई मायने नहीं हैं. मैंने अपनी प्रार्थनाओं में ये कहा कि माँ को उनकी निधि किसी तरह वापस मिल जाये जब कि मैं जानती हूँ ये उस निधि के खो जाने से भी ज्यादा आश्चर्यजनक घटना होगी.

फोन रखने के बाद मैं बेहद उदास हो गयी. मुझे माँ के लिए बहुत बुरा लग रहा था. पर अभी दिन खत्म नहीं हुआ था. मुझे लगा किसी दोस्त से बात करके जी हल्का कर लूँ , ये कहाँ पता था कि दिन और भी बुरा होने जा रहा है. इस से पहले कि मैं ये घटना बताकर अपना जी हल्का करती, उस दोस्त ने कुछ ऐसी कड़वी बात कही कि जी और भी उदास हो गया. जिन्हें हम अपना बहुत करीबी दोस्त समझ रहे होते हैं, वो अगर एक दिन ये ऐलान कर दें कि वो हमारी दोस्ती की नौका में से कब के उतर चुके हैं, बिना कोई आहट किये, तो शक होने लगता है कि दोस्ती थी भी या नहीं. मुझे लगा कि मुझे इसका कारण पूछना चाहिए, सो मैंने पूछ ही डाला, पर मुझे लगा कि बस अभी मेरा ही समय बुरा चल रहा है. शायद कोई-कोई दिन ही इतना बुरा होता है कि सब कुछ अप्रत्याशित ही घट रहा होता है.

मुझे हर बात पर बड़ी जल्दी रोना आ जाता है , पता नहीं क्यूँ उस दिन एक भी आँसू नहीं टपका. मैंने कहीं सुन रखा है कि हर घटना हमारे लिए हर लिहाज़ से अच्छी ही होती है क्यों कि अच्छी घटनाएँ अच्छे पल देती हैं और बुरी घटनाएँ अच्छे सबक. पता नहीं ये मेरे लिए अच्छे पल थे या अच्छे सबक.....पर ये दिन बहुत कुछ दे गया. 

                            * * *                                * * *

अच्छे दिन और अच्छे सबक दोनों ही अच्छे दोस्त की कमी को पूरा कहाँ कर पाते हैं....दोस्त, जी बहुत उदास है उस दिन से....

मंगलवार, नवंबर 15, 2011

कितने छलावों के उस पार कोई एक सच होता है

दीवार पर लगी ढेर सारी तस्वीरों में से कुछ को एक दूसरी दीवार ने ढक लिया था, पर जो दिखाई दे रही थीं उनसे उस घर की खुशहाली का अंदाज़ा बखूबी लगाया जा सकता था. छुप गयी तस्वीरों में शायद कोई दूसरा पहलू भी छुपा हो. गुलाबी सी ठंड में भी ठंडे फर्श पर लेटकर लड़की अपने गालों पर बह रहे गर्म आंसुओं को शायद कोई राहत पहुँचाना चाह रही थी. दुबले से शरीर पर तंग पोशाक उसकी असहजता को और बढ़ा रही थी. कहीं भी राहत नहीं...उसने लेटे-लेटे ही सोचा.


कितने छलावों के उस पार कोई एक सच होता है. असहजता में ही वो फर्श छोड़कर खिड़की के पास जा खड़ी हुई तब उसे अंदाज़ा हुआ कि वो इस समय पहली मंज़िल पर खड़ी है, जहाँ से छिछले पानी से भरा हुआ कुंड दिखाई दे रहा है...दूर कहीं से चार-पाँच सुन्दर लड़कियां उसी की तरह की भारी पोशाकों में सहजता से दौड़ती हुई आती दिखाई दीं...जो दोनों हाथों से अपनी पोशाक को ज़रा ऊपर किये हुए कुंड के पानी को लांघकर उसकी तरफ बढ़ी आ रही थीं.


इस समय वह किसी का सामना करने की स्थिति में नहीं है...उनका तो बिल्कुल भी नहीं जो उसकी आँखे देखकर उसके दिल का हाल पढ़ लेते हैं...लड़की ने छुप जाने के लिए एक अकेला सुनसान कोना ढूंढ लिया. जब कोई आवाज़ देगा तब ही सोचा जायेगा.बचपन में खेला गया खेल 'हाइड एंड सीक' याद आ गया और वो बेफिक्री भी, जो तब हुआ करती थी. अब जिनसे छुपना था, वो लोग उसे कभी न ढूंढ पायें ऐसा उसने सोचा. एक बार उसे ये ख्याल भी आया कि अपने सब ख्यालों का गला घोंट दे. इसी सुनसान कोने में अपने चारों ओर एक ऐसी दीवार खड़ी कर ले कि वहाँ से हवा का आवागमन भी बंद हो जाये...


इन सारे ख्यालों की वजह वो ही तो है...जो छलावों के उस पार का सच है...

         ***                                   ***                               ***
        
अब सब बदलना चाहिए. उसे प्यार करते  रहने की आदत...उसे याद करते रहने की आदत...और फिर रंगीनियों में भी उदास रहने की आदत...

इस  बार जब मौसम बदलेगा , आँसुओं की गरमाहट गालों पर नहीं , महबूब के होठों पर धर दी जायेगी...

मंगलवार, नवंबर 08, 2011

अपनी आत्मा के बारे में ही सबसे ज्यादा सोचना चाहिए


अपने हिस्से का आसमां चुराते-चुराते नादान शाम न जाने कब पूरा आसमां पाने की फ़िराक में रहने लगी. शायद उसे इस बात का गुमां न रहा कि आसमां  के पास खुश होने की और भी वजहें हैं. यूँ एक दिन आसमां जब उसके आगोश में सिमट आया तो शाम अपने चाहने वालों से भी जी चुराने लगी. क्षितिज पर हुई इस मुलाकात के बाद आसमां ने अपनी रात चाँद-तारों के साथ बिताई और वो अँधेरे और रोशनी के इस खेल से खुश था. सुबह के खिलते सूरज को भी तो उसने अपनी खुशी की वजह बताया.


         शाम के आस-पास सुखद रंगों, ध्वनियों,प्रकाश और गतियों का जादू सा था. वह सिर्फ तभी नहीं नाचती थी जब उसकी आत्मा बहुत थकन महसूस करती थी या आराम करना चाहती थी. अब अचानक उसने आसमां को एक बिल्कुल नए और अप्रत्याशित रूप में देखा. ऊब पैदा करने वाले रूप के साथ नाचना संभव नहीं था इसलिए उसकी आत्मा ने आराम की इजाज़त माँगी.


            इस अप्रिय और अटपटी सी बात के बाद शाम कुछ उदास सी रहने लगी. आसमां से वो केवल एक बात के लिए मिन्नत करती है कि उसे इस असह्य स्थिति से उबार लिया जाये जिसमें वह इस समय है. शाम का ह्रदय हताशा से फटा जा रहा है और उदासीन और शांत चेहरे के साथ वो चुपचाप आतंरिक संघर्ष कर रही है. ये वही शाम है जिसे आसमां ने अपना प्यार भेंट किया है और बदले में प्यार ही पाया है. अपने आस-पास प्रकृति की उदासी में डूबे होने के बावजूद शाम के मन में आसमां से मिलने की उमंग है. बात साफ़ है कि शाम ने कहीं सुन रखा था अपनी आत्मा के बारे में ही सबसे ज्यादा सोचना चाहिए.

शनिवार, अक्टूबर 15, 2011

जिसके बिना जिया न जा सके

कोई आठ-दस सीढ़ियाँ नीचे उतरकर दाहिनी ओर एक मंदिर का गर्भगृह था वो. उस मंदिर का मुख्यद्वार जो कुछ असमान आकार के दो पटों से मिलकर बना था, बंद लग रहा था. उसने उस दरवाज़े के छोटे वाले पट को धीरे से धकेला तो वो खुल गया. चार-पाँच सीढ़ियाँ नीचे उतरते ही अन्दर से एक दाढ़ी वाले व्यक्ति आते दिखाई दिये जो संभवतः इस मंदिर के पुजारी थे. मंदिर के गर्भगृह से सुगन्धित धुंआं उठ रहा था जो किसी हवन के धुंएं जैसा प्रतीत होता था. पुजारी ने उसे अन्दर बुलाना चाहा पर वहाँ के माहौल में कुछ अटपटापन भांपकर उसे मंदिर के अन्दर जाने का मन नहीं हुआ. एक पल और सोचने के बाद उसने मंदिर से बाहर आना ही उचित समझा. उसने पुजारी से बहाना किया कि बाहर कोई इंतज़ार कर रहा है इसलिए अभी वापस जाना ज़रूरी है. दरवाज़े के उस छोटे पट को बंद करके बाहर की हवा में पैर रखते ही उसने राहत की साँस ली.

बाहर कोई नहीं था जो उसका इंतज़ार करता. मंदिर के बाहर मैदान में इक्का-दुक्का बेंचें लगी थीं उसने दो पल वहाँ बैठना चाहा. एक बेंच पर ज़रा छाँव थी , उसी को उसने अपने बैठने के लिए चुना.

 उसे याद आया कि जब-जब उसने कोई सपना देखा, तब चारों ओर पानी ही पानी हुआ करता था और चंद सीढ़ियाँ, जिनसे चढ़कर केवल ऊपर की ओर जाया जा सकता था. नीचे आने के समय वो सीढ़ियाँ वहाँ से गुम हो जाया करती थीं, उसने हमेशा बस एक पुल पर खुद को अकेले खड़े पाया, पता नहीं किसका इंतज़ार करते हुए.... उसे कभी कोई वहाँ आता नहीं दिखाई दिया, न ही कोई वहाँ से जाता था.

दूर कहीं से एक रेलगाड़ी की आवाज़ सुनाई दी. इस आवाज़ को सुनकर उसे अपना बचपन ज़रूर याद आता था. बचपन में जब भी रेलगाड़ी का सफ़र करते और वो किसी पुल के ऊपर से गुज़रती थी पुल के नीचे का पानी उसके मन में एक झुरझुरी पैदा कर देता था. उसने बचपन के ख्यालों को दूर धकेला और वापस उसी जगह लौटना चाहा. 

उसकी कहानी का कोई नायक नहीं था, ऐसा उसे लगा. कोई प्रतिद्वंदी भी नहीं. बस वो खुद और उसका अकेलापन.... जिसने भी उससे प्यार किया जी भर कर किया, पर उसे कभी कोई ऐसा नहीं मिला जिसके बिना जिया न जा सके और उसे हमेशा उसी एक की तलाश थी. आज फिर उसे ऐसा ही महसूस हो रहा है, जैसे वो किसी ऐसे पुल के ऊपर है जिससे नीचे जाने का कोई रास्ता नहीं है. चारों ओर बस पानी ही पानी है. दूर पश्चिम में डूबता हुआ सूरज भी उसी की तरह किसी का इंतज़ार करते-करते थक कर वापस जा रहा है....